कारगिल युद्ध में लड़ने वाले वो सैनिक जो अब असम में एनआरसी से बाहर हैं
वैसे तो ईस्ट इंडिया कंपनी में भारत में आने के बाद लगातार जीत हासिल करती चली गई और उस दौरान दुनिया के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि एक कंपनी ने एक देश पर कब्ज़ा कर लिया था. लेकिन इस सफ़र के दौरान एक मोड़ पर उन्हें ऐसी शर्मनाक हार मिली थी जिसने कंपनी का वजूद ही ख़तरे में डाल दिया था. बाद में कंपनी ने अपने माथे से ये दाग़ धोने की पुरज़ोर कोशिश की. यही वजह है कि बहुत कम लोग जानते हैं कि सिराजुद्दौला और टीपू सुल्तान पर जीत हासिल करने से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने औरंग ज़ेब आलमगीर से भी जंग लड़ने की कोशिश की थी लेकिन इसमें बुरी हार का सामना करने के बाद अंग्रेज़ों के दूतों को हाथ बांधकर और दरबार के फ़र्श पर लेटकर मुग़ल बादशाह से माफ़ी मांगने पर मजबूर होना पड़ा था. यह क़िस्सा कुछ यूं है कि अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के गठन के बाद भारत के विभिन्न इलाक़ों में अपने व्यावसायिक केंद्र स्थापित करके व्यवसाय शुरू कर दिये थे. इन इलाक़ों में भारत के पश्चिमी तट पर सूरत, बम्बई और पूर्व में मद्रास और कलकत्ता से 20 मील दूर गंगा नदी पर स्थित बंदरगाह हुगली और क़ासिम बाज़ार अहम थे. ...