चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

कह ये भी सकते हैं कि इसी दायरे में वह कालाधन भी खपा जो भ्रष्टाचार से जुड़ा था. यानी सरकारी बाबुओं से लेकर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की वह रकम जो सरकार की नज़र में नहीं थी, उसने एक समानांतर अर्थव्यवस्था ऐसी बना ली थी जिसने 2008-09 में भी भारत को दुनिया में आई मंदी की चपेट में नहीं आने दिया.
इसलिए सार्वजनिक सेक्टर हो या निजी सेक्टर, घाटा या डूबने के हालात इस दौर में इक्का-दुक्का ही आए. ये सिलसिला 2010 तक जारी रहा, इससे
मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार में कुछ रुकावट मनरेगा और शिक्षा की गारंटी सरीखी योजनाओं से इसलिए आई क्योंकि वैकल्पिक खाका कैसे खड़ा हो, इस पर काम नहीं किया गया था.
यानी मनरेगा से ग्रामीण भारत पर ख़र्च की जाने वाली रकम और शिक्षा की गारंटी योजना को लागू किए जाने की प्रकिया से निजी क्षेत्र को अलग रखा गया जबकि सीएसआर की रकम और शिक्षा में निजी पूंजी के ज़रिये विस्तार दिया जा सकता था.
लेकिन फिर भी ध्यान दें तो 2014 में मनमोहन सिंह की हार के बाद मोदी सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनिया घाटे में नहीं मिली थीं.
2014 में निजी या सार्वजनिक क्षेत्र कोई बहुत फ़ायदे में नहीं थे तो घाटे में भी नहीं थे. और यहीं से ये सवाल पैदा हुआ था कि मोदी सरकार आर्थिक सुधार के 'ट्रैक 3' या 'ट्रैक 4' (जेनरेशन 3 या 4) को अपनाती है या फिर संघ के स्वदेशी को.
जीडीपी अभी 5 फ़ीसदी पर आ गई है. मगर 2022 तक जब इन्फ़ॉर्मल सेक्टर की जीडीपी सामने आएगी, तब जीडीपी की रफ़्तार 2 फ़ीसदी भी रह जाए तो बड़ी बात होगी.(पांच साल में ही इनफ़ॉर्मल सेक्टर के विकास की दर की जानकारी मिलती है)
तो अब सवाल यही है कि क्या मोदी सरकार अपने किए एलान को वापस लेकर आर्थिक सुधार के रास्ते को पकड़ना चाहेगी या फिर अर्थव्यवस्था का राजनीतिक उपाय करेगी?
क्योंकि बिगड़ी अर्थव्यवस्था ने संकेत साफ़ दे दिए हैं कि पॉलिटिकल इकॉनमी के ज़रिये कॉरपोरेट को संभालना, जांच संस्थाओं के ज़रिये राजनीति को साधना और आसमान छूती बेरोज़गारी के लिए राजनीतिक राष्ट्रवाद को जगाना ही नए भारत की सोच है.
इनकार भी नहीं किया जा सकता है.
ध्यान दीजिए कि स्वदेशी का राग मोदी सत्ता ने बिल्कुल नहीं गाया. लेकिन चले आ रहे आर्थिक सुधार को भ्रष्ट्राचार के नज़रिये से ही परखा और एक-एक करके कमोबेश हर क्षेत्र को सरकारी नज़र के दायरे में इस तरह लाया गया जहां सरकार से नज़दीकी रखने पर ही लाभ मिलता.
साथ ही कॉरपोरेट पॉलिटिकल फ़ंडिंग सबसे ज़्यादा ना सिर्फ़ मोदी सत्ता के दौर में हुई बल्कि 90 फ़ीसदी बीजेपी को हुई. लेकिन वक्त के साथ सरकार सेलेक्टिव भी होती गई और जो प्रतिस्पर्धा निजी क्षेत्र में होनी चाहिए थी, वह सरकार की मदद से बढ़ती कंपनियों ने खत्म कर दी.
साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा करने वाली निजी कंपनियों को सरकार ने ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियो को ख़त्म करने की क़ीमत पर बढ़ाया. बीएसएनएल और जियो इसका बेहतरीन उदाहरण है.
ये सब इस हद तक खुले तौर पर हुआ कि रिलायंस ने अपनी कंपनी जियो के प्रचार प्रसार का एंबेसडर और किसी को नहीं, प्रधानमंत्री मोदी को ही बना दिया. दूसरी ओर तिल-तिल मरते बीएसएनएल के कर्मचारियों को वेतन तक देने की स्थिति में सरकार नहीं आ पाई.
इसी तरह अडानी ग्रुप को बिना किसी अनुभव के सिर्फ़ सत्ता से क़रीबी की वजह से जिस तरह पोर्ट और एयरपोर्ट दिए गए, उससे भी आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा वाली सोच खारिज हो गई. लेकिन सबसे व्यापक असर पड़ा नोटबंदी और जीएसटी से.
दरअसल पहले से चली आ रही व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए कोई नई समानांतर व्यवस्था खड़ी न करने से ही संकट शुरू होता है.
1991 से शुरू हुआ आर्थिक सुधार बेशक आवारा पूंजी के रास्ते जगमगाया लेकिन जब उसे ख़त्म करने की शुरुआत हुई तो भ्रष्टाचार थमा नहीं बल्कि चंद हथेलियों में सिमट गया. और इसमें सबसे बड़ी हथेली राजनीतिक सत्ता की ही रही.
दूसरी तरफ़ वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के किसी ढांचे को खड़ा करने की जगह मोदी उस समाजवादी रास्ते पर निकल पड़े जहां राजनीतिक तौर पर किसान-मज़दूर को लुभाने के लिए धन बांटना तो था लेकिन इस प्रक्रिया में धन आएगा कहां से, इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं गया.
फिर आर्थिक सुधार के दौर में फ़ॉर्मल सेक्टर से जो लाभ इनफ़ॉर्मल सेक्टर को मिल रहा था, वह भी न सिर्फ़ थम गया बल्कि वहां ख़ून के आंसू बह निकले हैं.
नोटबंदी ने उस असंगठित क्षेत्र की कमर तोड़ दी जो समानांतर अर्थव्यवस्था को बरकरार रखे हुए था. वहीं जीएसटी ने आर्थिक सुधार के नज़रियों को ताबूत बनाकर उस पर कील ठोंक दी. इससे इनफ़ॉर्मल सेक्टर सरकार की निगाह में आया जहां सरकार इससे वसूली करती दिखती.
खेती की ज़मीन का मॉनिटाइज़ेशन शुरू हुआ तो छोटे-मंझोले उद्योग धंधे भी जीएसटी के दायरे में आए. और जीएसटी की उलझन के कारण उत्पादन बाज़ार तक नहीं पहुंचा. जो बाज़ार तक पहुंचा, वह बिका नहीं. यानी आर्थिक सुधार की जो रफ़्तार देश में हर तबके को उपभोक्ता बनाकर उसकी खरीद की ताक़त को बढ़ा रही थी, उस पर ब्रेक लग गया.
असंगठित क्षेत्र के 45 करोड़ से अधिक लोगों के सामने रोज़गार का संकट उभरा तो संगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों के सामने ये उलझन पैदा हो गई कि वो बिना पूंजी कैसे आगे बढ़े. और इस प्रकिया में रियल एस्टेट से लेकर हर उत्पाद कारखाने में ही सिमटकर रह गया.
ग्रामीण भारत को नोटबंदी ने रुलाया तो जीएसटी ने शहरी भारत को. सबसे बड़ा सवाल इस प्रक्रिया में यही उभरा कि अगर आर्थिक सुधार को मोदी सत्ता ने क्रोनी कैपिटलिज़्म और भ्रष्टाचार के नज़रिये से देखा तो उस व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए समानांतर कोई दूसरी व्यवस्था खड़ी क्यों नहीं की?

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