कौन हैं आईएमएफ़ की प्रमुख अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय मूल की प्रोफ़ेसर गीता गोपीनाथ को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) का प्रमुख अर्थशास्त्री नियुक्त किया गया है.
आईएमएफ़ ने इस संबंध में ट्विटर पर जानकारी दी है. वो मौरी ओब्सफ़ेल्ड की जगह लेंगी. मौरी इस साल के अंत में रिटायर हो जाएंगे.
गीता गोपीनाथ इस वक़्त हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज़ ऑफ़ इकनॉमिक्स में प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने इंटरनेशनल फ़ाइनेंस और मैक्रोइकनॉमिक्स में रिसर्च की है.
आईएमएफ़ की प्रमुख क्रिस्टीन लगार्डे ने सोमवार को गीता गोपीनाथ की नियुक्ति की जानकारी देते हुए कहा, ''गीता दुनिया के बेहतरीन अर्थशास्त्रियों में से एक हैं. उनके पास शानदार अकादमिक ज्ञान, बौद्धिक क्षमता और व्यापक अंतरराष्ट्रीय अनुभव है.''
आईएमएफ़ में इस पद पर पहुंचने वाली गीता दूसरी भारतीय हैं. उनसे पहले भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी आईएमएफ़ में प्रमुखसितंबर, 1965 को भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जब दिल्ली के रामलीला मैदान पर हज़ारों लोगों को संबोधित कर रहे थे तो वो कुछ ज़्यादा ही प्रफुल्लित मूड में थे.
शास्त्री ने कहा था, "सदर अयूब ने ऐलान किया था कि वो दिल्ली तक चहलक़दमी करते हुए पहुंच जाएंगे. वो इतने बड़े आदमी हैं, लहीम शहीम हैं. मैंने सोचा कि उनको दिल्ली तक पैदल चलने की तकलीफ़ क्यों दी जाए. हम ही लाहौर की तरफ़ बढ़ कर उनका इस्तेक़बाल करें."
ये शास्त्री नहीं 1965 के युद्ध के बाद भारतीय नेतृत्व का आत्म विश्वास बोल रहा था. ये वही शास्त्री थे जिनके नाटे क़द और आवाज़ का अयूब ख़ाँ ने मखौल उड़ाया था. अयूब अक्सर लोगों का आकलन उनके आचरण के बजाए उनके बाहरी स्वरूप से किया करते थे.
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शंकर बाजपेई याद करते हैं, "अयूब ने सोचना शुरू कर दिया था कि हिंदुस्तान कमज़ोर है. एक तो लड़ना नहीं जानते हैं और दूसरे राजनीतिक नेतृत्व बहुत कमज़ोर है. वो दिल्ली आने वाले थे लेकिन नेहरू के निधन के बाद उन्होंने यह कह कर अपनी दिल्ली यात्रा रद्द कर दी कि अब किससे बात करें. शास्त्री ने कहा आप मत आइए हम आ जाएंगे. वो काहिरा गए हुए थे. लौटते वक्त वो एक दिन के लिए कराची रुके. मैं प्रत्यक्षदर्शी था जब शास्त्री जी को हवाई अड्डे पर छोड़ने आए थे राष्ट्रपति अयूब. मैंने सुना उन्हें अपने साथियों को इशारा करते कि इसके साथ बात करने में तो कोई फ़ायदा ही नहीं है."
यही नहीं अयूब से सबसे बड़ी ग़लती तब हुई जब उन्होंने ये अनुमान लगाया कि कश्मीर पर हमले के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय सीमा नहीं पार करेगा.
अर्थशास्त्री रह चुके हैं.

केरल सरकार में भूमिका

केरल सरकार ने गीता को पिछले साल राज्य का वित्तीय सलाहकार नियुक्त किया था. गीता का जन्म केरल में ही हुआ था. जब केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने गीता की नियुक्ति की थी तो उस समय उन्हीं की पार्टी के कुछ लोग नाराज़ भी हुए थे.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार उस समय गीता ने कहा था कि ये पद मिलने के बाद वो सम्मानित महसूस कर रही हैं.
दिल्ली से स्नातक
गीता अमेरिकन इकनॉमिक्स रिव्यू की सह-संपादक और नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकनॉमिक रिसर्च (एनबीइआर) में इंटरनेशनल फ़ाइनेंस एंड मैक्रोइकनॉमिक की सह-निदेशक भी हैं.
गीता ने व्यापार और निवेश, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट, मुद्रा नीतियां, कर्ज़ और उभरते बाज़ार की समस्याओं पर लगभग 40 रिसर्च लेख लिखे हैं.
गीता साल 2001 से 2005 तक शिकागो यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर थीं.
इसके बाद साल 2005 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई.
साल 2010 में गीता इसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनीं और फिर 2015 में वे इंटरनेशनल स्टडीज़ एंड ऑफ़ इकनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर बन गईं.
गीता ने ग्रेजुएशन तक की शिक्षा भारत में पूरी की. गीता ने साल 
मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी बीबीसी को बताया कि वो लड़ाई ख़त्म होने के बाद पाकिस्तान गए थे. वे कहते हैं, "मैंने अयूब से पूछा कि ये आपने क्या किया? आप अच्छी तरह जानते थे कि आप आख़िर में जीत तो नहीं सकते थे. उन्होंने कहा कि तुम मुझसे ये सवाल मत पूछो. जब तुम भुट्टो से मिलोगे, तब उससे ये पूछना."
इसके बाद नैयर भुट्टो से भी मिले. वे कहते हैं, "जब मैं भुट्टो से मिला तो मैंने उनसे पूछा कि हर कोई कह रहा है कि ये भुट्टो की लड़ाई थी. भुट्टो ने कहा कि मैं इससे गुरेज़ नहीं करता. मैं समझता था कि अगर हम आपको हरा सकते हैं तो यही मौका है क्योंकि बाद में आप की इतनी ऑरडिनेंस फ़ैक्ट्रियाँ आ रही हैं कि हमारे लिए आपका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता. दूसरे मैंने सोचा था कि जब हम अपने लोग भेजेंगे तो घाटी के लोग उनके समर्थन में उठ खड़े होंगे लेकिन मेरी सोच ग़लत थी."
अयूब को इस लड़ाई के लिए मजबूर करने के बाद संयुक्त राष्ट्र में युद्ध विराम स्वीकार करना भुट्टो के लिए एक बड़ी शर्म का कारण होना चाहिए था. लेकिन इस मौके पर दिए गए उनके भाषण ने तटस्थ देशों को भले ही निराश किया हो लेकिन पाकिस्तान के लोगों ने इस इसके अक्खड़पन और तिरस्कार के लिए हाथोंहाथ लिया.
अयूब पर किताब लिखने वाले अलताफ़ गौहर लिखते हैं, "दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त मियाँ अरशद हुसैन ने तुर्किश दूतावास के ज़रिए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को एक कूट संदेश भिजवाया कि भारत पाकिस्तान पर 6 सितंबर को हमला करने वाला है. नियमों के अनुसार विदेश से राजदूतों के पास से आने वाले हर कूट संदेश को राष्ट्रपति को दिखाना ज़रूर होता है. लेकिन ये संदेश अयूब तक नहीं पहुंचाया गया. बाद में पता चला कि विदेश सचिव अज़ीज़ अहमद ने इस संदेश को इसलिए दबा दिया क्योंकि उनकी नज़र में अरशद हुसैन नर्वस हो जाने वाले शख़्स थे, जो शायद बेवजह डर गए होंगे."
बहरहाल अयूब को भारतीय हमले की ख़बर 6 सितंबर की सुबह 4 बजे मिली जब पाकिस्तानी वायु सेना के एक अधिकारी ने कहा कि भारतीय सैनिकों ने लाहौर की तरफ़ बढ़ना शुरू कर दिया है.
दूसरी तरफ़ लड़ाई के बाद लालबहादुर शास्त्री की छवि काफ़ी बेहतर हो गई ख़ास कर ये देखते हुए कि देश अभी भी नेहरू की मौत से उबरने की कोशिश कर रहा था और उनको भारत और उनकी ख़ुद की पार्टी में एक कामचलाऊ व्यवस्था के तौर पर ही देखा जा रहा था.
में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की.
इसके बाद उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में हीमास्टर डिग्री पूरी की. साल 1994 में गीता वाशिंगटन यूनिवर्सिटी चली गईं.
साल 1996 से 2001 तक उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी पूरी की.
ये भी पढ़ें...
सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च के श्रीनाथ राघवन कहते हैं, "वहाँ पर ओवर कॉनफ़िडेंस का माहैल बन गया था. एक तो वो ख़ुद जनरल थे. उन्हें लगा होगा कि नेहरू के गुज़र जाने के बाद तो नए प्रधानमत्री आए हैं, उनमें इतनी क्षमता नहीं होगी कि वो ये युद्ध झेल सकें ख़ास कर 1962 के बाद. दूसरे उनके जो मुख्य विदेश नीति सलाहकार थे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, उन्होंने उन्हें समझाया कि अगर हम इस समय भारत पर दबाव बनाएं तो कश्मीर का मसला हमारे पक्ष में सुलझ सकता है."
ब्रिगेडियर एए के चौधरी ने अपनी किताब सितंबर 1965 में लिखा है, "लड़ाई के कई साल बाद एक पूर्व कैबिनेट मंत्री ने अयूब से पूछा था कि आपने इस अभियान से पहले इसके फ़ायदे नुकसान के बारे में अपने लोगों से मश्विरा नहीं किया था? कहा जाता है कि अयूब ने करीब करीब कराहते हुए कहा कि बार बार मुझे मेरे सबसे कमज़ोर पक्ष की याद मत दिलाओ."

Comments

Popular posts from this blog

بيع لوحة مُهملة في مطبخ امرأة بملايين الدولارات

محمد بن سلمان يحذر من أزمة نفط عالمية إذا لم يتحرك العالم "لردع إيران"

لماذا يجيب الفرنسيون على أي سؤال أو طلب بكلمة "لا"؟